Wednesday, September 10, 2008

उच्च शिक्षा के भव्य व सुंदर कंगूरे कैसे ?

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत ने अनेक नए शिक्षण संस्थानों, शोध संस्थानों तथा उच्च स्तर की प्रयोगशालाओं की स्थापना की। तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व की दूरदर्शिता तथा वैज्ञानिकों के साथ सम्मानजनक संवाद के कारण इन संस्थाओं ने नाम कमाया। इसमें विकसित नई कार्य संस्कृति के परिणामस्वरूप भारत की वैज्ञानिक तथा तकनीकी क्षेत्र की क्षमताओं को सभी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहा। सारा विश्व आज भारतीयों के 'ज्ञान समाज' के निर्माण में किए जा रहे योगदान को सराहता है। परमाणु ऊर्जा तथा अंतरिक्ष विज्ञान में भारत की श्रेष्ठता उन्हीं संस्थानों में किए गए कार्यो का परिणाम है।

भारत में केवल आठ हजार विद्यार्थी बाहर से आते हैं, जिनमें अधिकांश भारतीय मूल के होते है। जबकि भारत से शिक्षा में स्थानों की कमी के कारण लगभग 80 हजार युवा प्रति वर्ष विदेशों में उच्च शिक्षा प्राप्त करने जाते है। इस कम संख्या का एक कारण अधिकांश संस्थानों की गुणवत्ता में कमी होना भी है। भारत को उच्च शिक्षा में केवल स्थान बढ़ाने है, बल्कि उसकी गुणवत्ता भी बढ़ानी है। गुणवत्ता की स्थिति क्या है, इस पर भारत के प्रधानमंत्री के एक वक्तत्व को याद करना काफी होगा। मुंबई विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में मनमोहन सिंह ने कहा था कि भारत के दो तिहाई विश्वविद्यालय तथा नब्बे प्रतिशत महाविद्यालय गुणवत्ता के मानकों पर औसत से नीचे कार्य निष्पादन कर रहे है।
नि:संदेह विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में बड़े परिवर्तनों की आवश्यकता है ताकि वहां से तैयार होकर निकलने वाले युवा सम्मानपूर्वक कौशल तथा ज्ञान के क्षेत्र में अपनी स्वीकार्यता पा सकें। भारत सरकार, राष्ट्रीय ज्ञान आयोग, सामान्य जन तथा प्रबुद्ध प्राध्यापक-सभी मानते है कि उच्च शिक्षा में गुणवत्ता कौशलों की कमी एक बड़ी असफलता का बिंदु रहा है।

आरक्षण शैक्षणिक शुल्क के साथ ही संस्था प्रमुखों की नियुक्तियां ऐसे बिंदु रहे हैं, जहां सरकार का दखल इन उच्च शैक्षणिक संस्थाओं के कामकाज को प्रभावित करता रहा है, जो प्रकारांतर से उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को भी प्रभावित करता है। विश्वविद्यालय उच्च शिक्षण संस्थानों की गरिमा और सार्थकता इसी में है कि उनका संचालन शिक्षण स्वायत्त रूप से हो। इसमें दखल एक तरह से राजनीतिक दखल की श्रेणी में आता है और जब राजनीति हावी होती है, तब कहीं कहीं शिक्षा की गुणवत्ता से समझौता करने की स्थिति उभरती है। अक्सर सरकारें ऐसा करते हुए दिखलाई पड़ती हैं बेहतर हो कि सरकार उच्च शिक्षा के क्षेत्र में मात्र सुविधा-प्रदाता की भूमिका निभाए और विभिन्न संस्थाओं को बुद्धिजीवियों, शिक्षाविदों योग्य प्रशासकों के नियंत्रण मार्गदर्शन में विकसित होने दे ताकि सरकार शिक्षण संस्थाओं के बीच सकारात्मक संबंध विकसित हों। यह जरूर ध्यान रखना चाहिए कि शिक्षण संस्थान अमीरों के बच्चों के पिकनिक स्पॉट बनें और वहीं सामाजिक संरचना में अपनी सार्थक भूमिका निभा सकें।

देश के विश्वविद्यालयों से समाज में ऐसी डिग्रियाँ जा रही हैं,जिसका समाज और जीवन की हकीकत से कोई लेना-देना नहीं है इसीलिए 80 प्रतिशत डिग्रीधारी छात्र आज बेरोजगार हैं । दुनिया के दूसरे देशों के मुकाबले हमारे पास तो पीएचडीधारकों तक की बहुत बड़ी कमी है। अकेले अमेरिका पूरे विश्व के 32 प्रतिशत शोधपत्र प्रकाशित करता है। इस मामले में भारत का हिस्सा सिर्फ 2.5 प्रतिशत है , और उनकी मौलिकता भी संदेह के घेरे में है

मेरे अनुसार कुछ फौरी उपाय जो आजमाए जाने चाहिए वह इस प्रकार हैं -


  • उच्च शिक्षा समाज के अधिकांशतः लोगों के पहुँच के अन्दर हो
  • पाठ्यक्रम में समयानुकूल बदलाव लाया जाय, साथ ही यह अनवरत हो
  • प्रायोगिक (प्रैक्टिकल) परीक्षाओं के नाम पर हो रही खानापूर्ति बंद हो और इसकी नीति स्थायी हो
  • छात्रों की अधिकांशतः शिक्षा प्रोजेक्ट आधारित हो , और उनमे भी परिवर्तन लगातार होता रहे बेहतर हो कि , आम जीवन की किसी समस्या से या किसी उद्योग की तकनीकी समस्या से इन प्रोजेक्टों का वास्तविक सम्बन्ध हो।
  • बढ़िया अध्यापकों की आज बहुत कमी है। सरकारी डिग्री पाए साक्षर,जिन्हें कोई और नौकरी नहीं मिलती है , वह उच्च शैक्षिक संस्थानों में अध्यापन कार्य करने लगते हैं दूसरा पहलू भी देखा जाना चाहिए कि इस भौतिक वाद में शिक्षकों को समाज-सुधारक को रोल निभाने की उम्मीद करने के स्थान पर उनसे अपने दायित्व को बढ़िया ढंग से निभाने की ही उम्मीद की जानी चाहिए मेरा तो मानना है की इस मामले में धन की भी कमी नहीं आड़े आनी देनीचाहिए
  • पी एच डी आदि भी अधिकांशत: खानापूर्ति का ही दूसरा नाम बनकर रह गया है। कोई भी शोधकर्ता या गाइड कोई चुनौतीपूर्ण विषय को हाथ में लेकर उसका मौलिक समाधान प्रस्तुत करने का कष्ट उठाने के लिये आवश्यक आत्मविश्वास नहीं जुटाना चाहता।
  • परीक्षा व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता है मौलिक सोचने-विचारने और तर्क-वितर्क करने वाला औसत अंक ही जुटा पाता है। रटने की प्रवत्ति के स्थान पर मौलिक सोच,परिष्कार को महत्व दिया जाना चाहिए
  • साथ ही हमें यह भी समझना चाहिए कि प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था संपूर्ण शैक्षिक व्यवस्था की नींव है अतः उस पर माध्यमिक शिक्षा का महल भी खड़ा करने का लिए पूरे नेक मन से किए गए परिवर्तन चाहिए तभी उस महल में उच्च-शिक्षा के सुंदर भव्य अंगूर लग पाएंगे








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