सोमवार, 16 फ़रवरी 2009

विज्ञान के प्रति घटता रुझान

भारत में आज फिर से विज्ञानं के प्रसार प्रचार की आवश्यकता है. वर्त्तमान में विज्ञानं अपनी पहचान खो रहा है. विज्ञानं के पहचान खोने का प्रमुख कारण प्रोफेशनल कोर्सेस का बढ़ता प्रचलन है. आज कल हर छात्र की मानसिकता यह है कि वह कैसे कम से कम समय में रुपय और नाम कमाए. प्रोफेशनल कोर्सेस के सलेरी पकेज छात्रों को रातों रात अमीर बना रहें हैं. जबकि विज्ञानं के करियर में न तो इतना पैसा है और न ही इतनी चमक दमक. यदि छात्रों के ध्यान इसी तरह विज्ञानं की तरफ़ से हटता रहा तो एक दिन देश में वैज्ञानिकों और रिसर्चर की कमी पड़ जायेगी. और देश विज्ञानं में पिछड़ने लगेगा. सरकार को चाहिए विज्ञानं में करियर से सम्बंधित कुछ सुविधाएँ दी जायें. और विज्ञानं विषय को कुछ रोचक बनाया जाए जिससे छात्रों की दिलचस्पी बढे और सबसे अहम बात कि नौकरी के ज़्यादा से ज़्यादा अवसर दिए जायं.

मंगलवार, 20 जनवरी 2009

HigherEducation

आपका यह मंच शिक्षको के विचार व्यक्त कराने के लिए ,विचार विमर्श करने के लिए बहुत प्रशंसनीय है .उच्च शिक्षा के गिरते स्तर पर भी ध्यान देना बहुत आवश्यक है .आज महाविद्यालयों की स्थिति बद से बदतर होती जा
रही है.लगभग समस्त स्थान पर यही हाल है.उम्रदराज शिक्षक वेतन वृद्धि तो पूरी चाहते है पर अध्यापन नही ।
ये कर्तव्य का भर वे शिक्षक उठा रहे है जो अस्थाई है व कई वर्गों में कम कर रहे है.क्या यह चिंता का विषय नही
होना चाहिए कि जिन युवा पर राष्ट्र को दिशा देने का भार डाला जा रहा है वह स्वयं कितने दिशाहीन होते जा रहे
है .सूचना के इस युग में उच्च शिक्षा आयोग के द्वारा सूचना न दिया जाना इस तथ्य को सिद्ध करता है कि
भ्रष्टता चरम पर है.

शुक्रवार, 16 जनवरी 2009

ऐसा हो अनुशासन .....!!!

विद्यालय विद्यार्थियों का भी उतना ही होता है जितना कि शिक्षकों, प्रधानाध्यापकों का और यह सरकारी स्कूलों के लिए विशेष रूप से सही है। शिक्षकों और विद्यार्थियों में परस्पर निर्भरता होती है, खासकर आज के दौर में जब सीखने का काम सूचना की उपलब्धि पर निर्भर करता है और ज्ञान का सृजन उन संसाधनों की नींव पर आधारित जिनके केन्द्र में शिक्षक होता है। शिक्षक और विद्यार्थी दोनों ही एक दूसरे के बिना कार्य नहीं कर सकते। शिक्षा के संपादन को शिक्षक और विद्यार्थी वाली समझ से आगे बढ़ कर प्रेरक सुगम बना कर विद्यार्थी की तरफ़ आना होगा जिसमें सभी के पास यह सुनिश्चित करने का अधिकार और जिम्मेदारी होगी कि शैक्षिक काम हो।


वर्तमान में स्कूल के नियम और मानक ;परस्म्पराएँ विद्यार्थियों केअच्छेऔरउपयुक्तव्यवहार को परिभाषित करते हैं। अनुशासन बनाए रखना ज्यादातर शिक्षकों एवं वयस्क अधिकारियों ;अक्सर खेलवूफद के अध्यापकों और प्रबंधकों का विशेषाधिकार होता है। ये अधिकारी अक्सर कुछ बच्चों कोमॉनीटरके रूप में रख लेते हैं और उनको नियंत्राण एवं व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी दे देते हैं। इसमें सजा एवं पुरस्कारों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जो लोग इस व्यवस्था को लागू करते हैं वे बिरले ही इन नियमों पर या बच्चों पर पड़ने वाले उस प्रभाव पर प्रश्न उठाते हैं जो इस आज्ञा पालन से बच्चो के संपूर्ण विकास, आत्मसम्मान और शिक्षा में रुचि पर पड़ता है।


आज भी कईस्कूलों में बच्चों को शारीरिक और शाब्दिक या गैरशाब्दिक यातनाएं दी जाती हैं। स्कूल बच्चों को उनके सहपाठियों के सामने बेइज्जत भी करते हैं। आज भी कई शिक्षक, यहाँ तक कि मातापिता भी, यही सोचते हैं कि बच्चों को इस तरह की सजा या यातना देना बहुत जरूरी है। ये लोग इस तरह के व्यवहार से पड़ने वाले तात्कालिक और दीर्घकालिक अहितकारी प्रभावों से बिल्कुल अनभिज्ञ हैं।

शिक्षकों के लिए जरूरी है कि वे स्कूलों को नियंत्रित करने वाले नियमों और परंपराओं के पीछे दिए गए मूल-आधार पर चिंतन करें, और यह सोचें कि क्या ये नियम और परंपराएँ हमारी शिक्षा के लक्ष्यों के साथ संगति बिठा पाते हैं? कक्षा में चुप्पी बनाए रखने से सम्बंधित जो नियम होते हैं जैसे –‘एक बार में एक ही बच्चा बोलेयातभी बोलो जब सही उत्तर पता हो’, इस तरह के नियम समानता और बराबर अवसर देने के मूल्यों को कमजोर बनाते हैं और उन्हें क्षति पहुँचाते हैं। ऐसे नियम उन प्रक्रियाओं को भी हतोत्साहित करते हैं जो बच्चों की सीखने की प्रक्रिया में अंतनिर्हित होती हैं और सहपाठियों में समुदाय की भावना को विकसित होने से भी रोकते हैं। हालांकि इन नियमों से शिक्षकों के लिए कक्षाव्यवस्था की नजर से आसानहो जाती है औरपाठ्यक्रम पूरा करनाभी आसान हो जाता है।



अधिगम के व्यवस्थित अनुकरण के लिए और बच्चों की रुचियों एवं संभावनओं के विकास के लिए उनमें आत्मानुशासन का मूल्य और आदत डालना महत्वपूर्ण होता है। अनुशासन ऐसा होना चाहिए जो काम के संपन्न होने में मदद करे और जो बच्चों की सक्षमता को बढ़ाए। अनुशासन शिक्षक एवं बच्चे दोनों के लिए आजादी, एवंस्वायत्तता बढ़ाने वाला होना चाहिए। यह जरूरी है कि बच्चों को नियम विकसित करने की प्रक्रिया में शामिल किया जाए ताकि वे नियम के पीछे के तर्क को समझें और उसके पालन की अपनी जिम्मेदारी को भी महसूस करें इस तरह से बच्चे स्वशासन के लिए बनाई गई संहिता की प्रक्रिया के बारे में जानेंगे और लोकतान्त्रिक एवं निर्णय लेने की प्रक्रिया में भाग लेने के लिए जरूरी कौशल विकसित कर पाएंगे। इस तरह से, बच्चे शिक्षकों और विद्यार्थियों एवं आपस में होने वाले मनमुटाव को सुलझाने के लिए खुद भी कुछ तरीके ईजाद कर पाएंगे।

शिक्षकों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि नियम कम से कम हों और केवल ऐसे ही नियम बनाए जाएँ जिनका सहजता से पालन हो सकता है। नियम तोड़ने पर विद्यार्थियों को दंड देने से किसी का कोई भला नहीं होता, विशेषकर तब जब उसे तोड़ने के पर्याप्त कारण हों। उदाहरण के लिएकक्षा के शोरगुलपर शिक्षक एवं प्रधानाध्यापक हमेशा नाराजगी दिखाते हैं, लेकिन यह भी संभव है कि शोरगुल कक्षा की जीवंतता एवं सक्रियता का प्रमाण हो कि इसका कि शिक्षक कक्षा को नियंत्रित नहीं कर पा रहे हैं। इस प्रकार समयबद्धता को लेकर भी प्रधानाचार्य अकारण बहुत ही सख्त रुख अपनाते हैं। जो बच्चा ट्रैफिक जाम की वजह से परीक्षा में देरी से आता है उसे दंड नहीं मिलना चाहिए। फ़िर भी हम ऐसे नियमों को उच्च स्तरीय मूल्यों क्र रूप में लागू होते हुए देखते हैं। इन मामलों में अधिकारियों की औचित्यहीनता बच्चों, अभिभावकों एवं शिक्षकों के मनोबल का हास कर देती है। अगर बच्चे से यह पूछना याद रखें कि उसने नियम क्यों तोड़ा और अगर बच्चे की बात सुनी जाए तो बहुत फायदा हो सकता है।



शिक्षक और संसाधन के प्रमुख अगर सत्ता की जगह अधिकार का इस्तेमाल करें तो ज्यादा उचित होगा।औचित्यहीनता और मनमानापन शक्ति के लक्षण होते हैं, उनसे डर पैदा होता है, आदर नहीं। स्कूल के सहभागी प्रबंधन में ऐसी व्यवस्था को विकसित करने की जरूरत है जिसमें बच्चों, शिक्षकों और प्रबंधकों की सार्थक भूमिका हो। इस बात की भी आवश्यकता है कि बच्चों को अपनी परिषद् हेतु प्रतिनिधि चुनने के लिए प्रोत्साहित किया जाए और इसी तरह शिक्षकों, प्रशासकों और अध्यापकों को भी अपने आप को संगठित करना चाहिए।

मंगलवार, 16 दिसंबर 2008

विकासशील देशों में भी शिक्षा में भारत छठे स्थान तक पिछड़ा क्यों?

आर्थिक रूप से उभर कर आ रहे दुनिया के सात सब से बड़े देशों में शिक्षा के मामले में भारत पिछड़ा हुआ है और इन देशों में उस का क्रम छठा है। शिक्षा के मामले में इन सात देशों में रूस सब से आगे है।
एस्सोचेम (एसोसिएटेड चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स द्वारा कराए गए सर्वे के परिणामों ने बताया है कि भारत की प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा क्षेत्र और जंनसाँख्यिक आधार पर गुणवत्ता के मामले में सब से पिछड़ा हुआ है।

शिक्षा के विकास के मामले में रूस के उपरांत चीन दूसरे स्थान पर रहा है, ब्राजील तीसरा, मेक्सिको चौथा, दक्षिण अफ्रीका पांचवाँ, भारत छठा और इंडोनेशिया सातवाँ स्थान प्राप्त कर सका है।

इस सर्वे ने बताया है कि भारत में प्राथमिक शिक्षा सब से अविकसित अवस्था में है। विद्यार्थी शिक्षक अनुपात सब से खराब भारत में है जो 32:1 है, सब से अधिक चीन और ब्राजील में 19:1 है। प्राइवेट स्कूलों की संख्या के मामले में भारत सब से ऊपर है यहाँ माध्यमिक शिक्षा के 42 प्रतिशत विद्यार्थी प्राइवेट स्कूलों में अध्ययन कर रहे हैं। महिला शिक्षा के मामले में भारत की स्थिति शर्मनाक है। रुस और ब्राजील में स्कूलों में विद्यार्थियों की कुल भर्ती में छात्राओं का अनुपात 56 प्रतिशत से अधिक है जब कि भारत में केवल आठ प्रतिशत।

उच्च शिक्षा के मामले में भारत आगे है। लेकिन विश्व के सब से अच्छे 100 बिजनेस स्कूलों में से केवल एक भारत में है जब कि सब से अच्छे 200 विश्वविद्यालयों में से एक भी भारत में नहीं है।

भारत में शिक्षा की इस दुर्दशा का मुख्य कारण प्राथमिक शिक्षा में पिछड़ापन और स्त्री शिक्षा में बहुत पीछे होना है। स्त्री शिक्षा के मामले में भारत का स्थान 116 है।

गुरुवार, 9 अक्टूबर 2008

वैश्वीकरण की चपेट में हमारी शिक्षा प्रणाली

सबसे अहम् भूमिका शिक्षक की मानी जानी चाहिए , वह है देश के सुयोग्य देश के सुयोग्य देशवासियों के निर्माण की भूमिकापर हमारे नीति-निर्माताओं के कर्मों क़दमों से यह बात सिर्फ़ दिखावटी लिखित आदर्शों में ही बची हैशिक्षकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने आप को उन पुराने आदर्शों के साथ बचाने की हैवैश्वीकरण की चपेट में सबसे ज्यादा शिक्षक शिक्षा प्रणाली ही आए हैं

पिछले 15 सालों से विकास की इस अधूरी चाल से विश्व बैंक के कहने से ही हर क्षेत्र की नीतियों का निर्माण किया जा रहा हैइसकी जड़ में हमारी शैक्षिक संस्थान भी चुके हैंस्कूलों और कालेजों में शिक्षक का कैडर विलुप्त प्राय होता दिख रहा हैशिक्षकों की जगह ऐसे अप्रशिक्षित लोग ले रहें हैं जो तो मानक योग्यता रखते हैं और शिक्षण कार्य में उनकी रुचि या स्थायित्वशिक्षक जिसे गुरु कहा जाता था , अब कहीं शिक्षा मित्र तो कहीं कांट्रेक्ट पर काम-चलाऊ पद नाम धारीशिक्षक संगठनों ने अपनी कमियों के चलते शुरुवात में किए गए विरोध को भी बंद कर दिया हैजाहिर है की वैश्वीकरण की इस आंधी में आज सबसे बड़ी जरूरत शिक्षक नाम के कैडर को बचाने की हैपर वैश्वीकरण के पुरोधाओं के उच्च पदों पर बैठे होने के चलते यह होता दिखे , यह इतना आसान नहीं लगता है

दूसरी चुनौती अपनी शिक्षा प्रणाली को बचाने की हैआर्थिक उदारवाद के इस दौर में आज देश भर में शिक्षा के दुकाने खुल गई हैंकेन्द्र और राज्य सरकारों की नीतियां सरकारी स्कूलों को तिरष्कृत कर निजी स्कूलों को बढ़ावा देने की हैंनिजी स्कूलों को दिए जा रहे बढावों और महिमा-मंडन से , शिक्षा आम आदमी से दूर होती दिख रही हैसरकार निजी स्कूलों को बढ़ावा तो देती है लेकिन सरकारी स्कूलों को सुधरने या निजी स्कूलों की तर्ज पर विकसित कर जानता को गुणवत्ता - पूर्ण शिक्षा देने में असफल रही हैहमारी परम्परागत शैक्षिक प्रणाली धवस्त होती जा रही हैआगे की पीढियां अच्छे कर्मी तो हो सकते हैं लेकिन सुयोग्य नागरिक बने इसमे संदेह है

तीसरी प्रमुख चुनौती है की शिक्षा कैसी हो , यह तय करने वाले शिक्षाविद नहीं बल्कि ब्यूरोक्रेट्स और कारपोरेट घराने के मुखिया हैंसरकार इनकी गोद में बैठ कर शिक्षा के क्षेत्र में बाजारीकरण को को बढ़ावा देने के लिए पब्लिक -प्राइवेट-पार्टनरशिप का राग अलाप रही हैजबकि असल निशाना उन कारपोरेट घरानों को लाभ पहुचने शिक्षा के क्षेत्र से अपना पीछा छुडाने का ही हैदर-असल 3p के जरिये शिक्षा के सरकारी संसाधनों को पब्लिक - प्राइवेट लूट को ही आधिकारिक बनने की कोशिश की जा रही है

जाहिर है इस मुहिम में सभी को जागरूक करना होगा , नहीं तो कंही देर हो जाए ?

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2008

उच्च शिक्षा से समझौता

आज के दैनिक जागरण के इस आलेख को साभार यंहा प्रस्तुत कर रहा हूँ .......जगमोहन सिंह राजपूत ,जोकि NCERT के पूर्व-निदेशक रहे हैं द्वारा लिखित यह लेख उच्च शिक्षा में गुणवत्ता केगिरावट के लिए राजनीतिक उदेश्यों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं । वह उच्च शिक्षा से जुड़े कई मुद्दों पर अपनी राय बेबाक हो कर रखते रहे हैं

इस वर्ष भारत सरकार ने छह नए आईआईटी शुरू किए हैं। इनमें प्रवेश हो चुका है। चयनित विद्यार्थियों को शिक्षा देने तथा उसकी व्यवस्था करने का दायित्व पहले से चल रहे आईआईटी संस्थानों को दे दिया गया है। नए संस्थानों के भवन, प्रयोगशाला, उपकरण, पुस्तकालय, छात्रावास इत्यादि का कोई प्रबंध नहीं हुआ है और ही प्राध्यापकों की नियुक्ति हुई है। इस वर्ष जब भारत सरकार का बजट प्रस्तुत किया गया था तो उसमें ग्यारहवीं योजना में तीन आईआईटी स्थापित करने के लिए 50 करोड़ रुपये का प्रावधान था। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने तीन आईआईटी को बढ़ाकर छह कर दिया। साथ में इन सभी को इसी वर्ष खोले जाने का आदेश भी दे दिया। कहा जा रहा है कि नए संस्थानों के व्यवस्थापक सरकार से बार-बार धन आवंटन का अनुरोध कर रहे हैं। इस धनराशि से प्राध्यापक तैनात किए जाएंगे तथा अन्य सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी। अनेक दशकों में निर्मित तथा वैश्विक स्तर पर स्वीकृत गुणवत्ता तथा विश्वसनीयता वाले आईआईटी संस्थानों की गरिमा पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा, सरकार को इससे कोई सरोकार नहीं है। यह दुर्भाग्य की स्थिति है। यही नहीं, इससे कुछ अन्य महत्वपूर्ण पहलू भी उजागर होते हैं। आईआईटी एक्ट स्वायत्तता के लिए पूरी तरह सशक्त है। एक बार बजट स्वीकार हो जाने के बाद इन संस्थानों के निदेशकों को सभी अधिकार प्राप्त हो जाएंगे। उन्हें मंत्रालयों से निर्देश लेने की आवश्यकता नहीं है। पिछले कुछ वर्षो में मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने लगातार इन संस्थानों को आदेश दिए हैं। सामान्य जन यह देखते रहे हैं कि मंत्रालय के इशारे पर फीस घटाई गई, फिर सरकार बदलने पर निर्णय उलट दिया गया। अध्यापकों की कमी की शिकायत करते रहने वाले इन संस्थानों पर 27 प्रतिशत आरक्षण के लिए सीटें बढ़ाने का दबाव आया। इन्होंने तुरंत स्वीकार कर लिया। इस पर कहीं कोई चर्चा नहीं हुई कि पहले दो साल आवश्यक तैयारी की जाए और उसके बाद प्रवेश दिया जाए। तीन वर्ष में आरक्षण लागू करना था। संस्थान अपने प्रस्ताव को लेकर मंत्रालय पर दबाव डाल सकते थे और यदि आवश्यक होता तो न्यायालय की अनुमति प्राप्त करने का प्रयास कर सकते थे। अथक प्रयासों से बनी अपनी ब्रांड वैल्यू बचाने की कोशिश तो की ही जानी चाहिए थी, लेकिन नए आईआईटी के विद्यार्थियों को अपने यहां स्वीकार करने के आदेश का पालन कर इन्होंने स्वायत्तता के प्रावधानों की धज्जियां उड़ा दीं। प्रश्न चाहे 27 प्रतिशत आरक्षण का हो, नए संस्थानों के विद्यार्थियों को पढ़ाने की जिम्मेदारी का हो या प्राध्यापकों की नियुक्तियों में एससी/एसटी के आरक्षण का हो, सभी निर्णयों में शैक्षिक आवश्यकताएं दरकिनार कर केवल राजनीतिक लाभ को ध्यान में रखकर निर्णय लिए गए हैं। वे शिक्षाविद तथा विद्वान जो इस प्रकार के निर्णयों के दूरगामी परिणामों से परिचित होने चाहिए, यह सब कुछ चुपचाप देखते रहे। यह चिंता का विषय है। संतोष की एकमात्र किरण के रूप में भारत सरकार के सलाहकार तथा देश के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक प्रोफेसर सीएनआर राव का बयान आया है। वह मानते हैं कि जिस ढंग से नए आईआईटी खुले हैं उससे उनकी प्रतिष्ठा तथा स्वीकार्यता पर जबरदस्त आंच आएगी। आश्चर्य है कि विचारधाराओं के पक्षधर कहां गायब हो गए हैं? विशेष रूप से वे सेकुलर शिक्षाविद कहां हैं जो स्कूल पाठ्यक्रम में वर्तनी की एक-दो त्रुटियों पर ही प्रदर्शन करने लगते थे? देश का गौरव माने जाने वाले इन संस्थानों के साथ जो ज्यादती हो रही है उसका मुखर विरोध यदि संस्थानों के अंदर से नहीं आता तो बाहर से बुद्धिजीवियों वैज्ञानिकों, व्यावसायिक विशेषज्ञों तथा प्राध्यापकों की ओर से तो अवश्य आना चाहिए। देश के सामने ऐसी कोई आपातकालीन स्थिति नहीं बनी थी कि छह नए आईआईटी इसी वर्ष खोल दिए जाते। इस जल्दबाजी का कारण यही है कि चुनाव का समय नजदीक रहा है। 14 वर्ष तक के सभी बच्चों के लिए नि:शुल्क प्रारंभिक शिक्षा का प्रावधान कर संविधान ने शिक्षा की प्राथमिकता तो पहले ही निर्धारित कर दी थी, लेकिन आज भी यह लक्ष्य कितना दूर है। यदि इसे प्राप्त कर लिया गया होता तो माध्यमिक शिक्षा का विस्तार एक आवश्यक परिणाम के रूप में होता और यह उच्च शिक्षा तक जाता। ज्वलंत सवाल यह भी है कि शिक्षा व्यवस्था का पुनर्निर्माण तथा पुनर्निर्धारण समाज के ज्ञान के लिए कैसे हो? इस पर राष्ट्रव्यापी चर्चा होनी चाहिए। 1953 में आचार्य विनोबा भावे ने कहा था कि कालेज में मुझे बहुत कुछ पढ़ाया गया, मगर ज्ञान नहीं दिया गया। आज इस स्थिति को बदलना है। युवाओं को केवल ज्ञान देना है, परंतु यह भी सिखाना है कि नए ज्ञान का सृजन कैसे हो? इसके लिए चाहिए एक सशक्त संस्थागत संस्कृति, जिसमें अध्ययन-अध्यापन में किसी भी प्रकार की कमी को स्वीकार किया जाए। पिछले तीन-चार वर्षो में अनेक नई संस्थाओं, विश्वविद्यालयों, स्कूलों, शोध संस्थानों की स्थापना की घोषणाएं हुई हैं। सामान्यत: इनका स्वागत होना चाहिए, परंतु जब इन्हें प्रारंभ करते समय मूलभूत आवश्यकताओं तथा संसाधनों का प्रावधान किया जा रहा हो तब यह समाज तथा उसके प्रबुद्ध वर्ग के लिए चिंता का विषय ही बन सकते हैं। उन्हें अपने विचार सरकार तथा जनता के सामने रखने चाहिए। भारत की युवा पीढ़ी के लिए नीतिगत तथा क्रियान्वयन, दोनों स्तर पर ठोस प्रयासों की बेहद आवश्यकता है। नई संस्थाएं तो खुलनी चाहिए, नए कौशल प्रशिक्षण केंद्र भी चाहिए, परंतु इस सबसे अधिक आवश्यक है संस्थानों की स्वीकार्यता, उपयोगिता, गरिमा तथा स्वायत्तता को बनाए रखना और उस पर आंच आने देना। हर स्तर पर शिक्षा की गुणवत्ता के सामने जो खतरे देखे जा रहे हैं उनका समाधान सरकारों पर छोड़ना संभवत: अब उचित नहीं है। विकल्पों की खोज होनी चाहिए तथा समाज के निष्ठावान व्यक्तियों को आगे आना चाहिए